flowerpot: Dear school
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Tuesday, July 6, 2021

डियर स्कूल (Conversation)


डियर स्कूल

        टन………….टन………… अरे!!! भाग कहा रहे हो? ये कोई स्कूल नहीं जो बेल सुना और दौड़ ने लगे, ठहरिए  रुकिए तो सही कहानी अभी शुरू हुई है।



        हर किसी के लिए तुम्हारे साथ बिताए पल सबसे बेहतरीन होते है और वो इतनी सारी यादों के साथ होते है जो और कहीं नहीं मिल सकती। वो पल जिसमें हम अपने मूल को जानते है जहां से हमारे भविष्य की नीव रखते है, वो पल जो बेशकीमती है।


       लगता है थोड़े आगे चले आए, कोई नहीं फिर से देखते है शुरुआत से।

 
     तुम्हारे पास आकर पता नहीं क्यों इतना सुकून मिलता था कि यही समय था जब हम स्कूल टाइम से पहले निकल जाते थे और छुट्टी के बहुत समय बाद घर पहुंचते थे। घरवालों को अक्सर शिकायत रहती थी कि ऐसा क्यों? लेकिन हमारे पास भी जवाब रहता था कि स्कूल के मंत्री है हम तो सब चीज़े और प्रार्थना का सारा कार्यक्रम तय करना होता हैं।



      सारे दोस्त राह देखते है अगर कुछ भी करना हो, किसी को कोई भी प्रकार का स्वार्थ नहीं, कोई निजी दुश्मनी नहीं, कोई भी टीम के खिलाफ नहीं, क्या एकता होती थी सब में।


   हर किसी की अपनी खुबिया‌ॅ थी, जैसे की कोई दौड़ ने का काम है तो कोई एक करेगा, या किसी से बातचीत करनी है तो कोई एक करेगा, छोटी सी मैनेजमेंट कमेटी हुआ करती थी जो सारे कार्यक्रम अपने तरीके से करती थी।


    हर किसी का एक अलग ही नाम हुआ करता था। लड़ना झगड़ना सामान्य था लेकिन वो गुस्सा सिर्फ एक दिन के लिए रहता था। आए दिन किसी न किसी को चोट लगती थी जिसमे ज्यादातर घरवालों को पता नहीं चलता था।



    वो कहानियां और टॉफियां जिनसे हम आसानी से खरीदे जा सकते थे। साइकिल चलाना भी स्कूल  रास्ते ही आता है, गिरते संभलते कुछ न कुछ खूबियां खुद में जोड़ते रहते। शिक्षक दिवस पर अपनी अलग ही अदाकारी दिखती थी।


     इन सब के साथ साथ कभी कभी तुम्हारे पास नहीं आने के भी सबके अलग ही बहाने होते थे। जो तुम्हारे पास रोते हुए आता था वो तुमसे दूर जाने में भी दुखी था, और यही तो था तुम्हारा प्यार, यादें जिसे गुड बाय कहना कितना मुश्किल था। हर कोई अपने स्कूल के दिन वापस जीना चाहता हैं क्योंकि यही वो पल है जहा हर कोई एक समान है, जहा हर कोई अपनी मनमानी के सकता है, जहा हर कोई कल की फ़िक्र किए बिना जीता है।

  
    हर किसी के पास अपनी कहानी है, ये तो मेरी थी आप भी अपनी यादें ताज़ा कर लीजिए। दो लाइन कहना चाहूँगा।


यादों की दीवारों में बंद अच्छे थे
खुली वादियों में कोई अपना नहीं है।
     

                                                  उत्तम दुधरेजीया

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